शिवसेना के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सबसे पहले यह जांचना होगा कि शिवसेना में वास्तव में विभाजन हुआ था या नहीं और क्या यह विभाजन केवल विधायक दल तक सीमित था या पार्टी के संगठन तक भी पहुंचा। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि पार्टी में विभाजन की शुरुआत विधायक दल से हो सकती है, लेकिन इसका असर संगठन और प्राथमिक सदस्यों तक भी पहुंच सकता है। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसका विरोध करते हुए कहा कि केवल विधायकों के अलग होने को राजनीतिक दल में विभाजन नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने शिंदे गुट के समर्थन में बताए गए 11 राज्य प्रभारियों के मुद्दे पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि राज्य प्रभारी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा होते हैं और किसी राजनीतिक दल की ताकत का आकलन केवल कुछ पदाधिकारियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। प्राथमिक सदस्यों की स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है। कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि आयोग ने शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और अंततः विधायक दल के बहुमत को आधार बनाकर चुनाव चिह्न विवाद का फैसला किया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके साथ बड़ी संख्या में लोगों का आना उनके शुरुआती संगठनात्मक समर्थन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री पद मिलने के बाद पार्टी के कई लोग स्वाभाविक रूप से उनके साथ आ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि चुनाव आयोग के पास मामले की सुनवाई का अधिकार था लेकिन उसने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया या स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत फैसला लिया, तो अदालत इसकी समीक्षा कर सकती है। वहीं, अगर आयोग के पास अधिकार ही नहीं था, तो कानूनी स्थिति अलग होगी। सुप्रीम कोर्ट फिलहाल उद्धव ठाकरे गुट की उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को मूल शिवसेना माना गया था और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था। मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।